Saturday, May 9, 2015

माँ (आकांक्षा पारिजात)



माँ
क्यों झेलना पड़ता है इन्हें हर दुख ।
क्यों नहीं है इनकी सिस्मत में सुख ।
कभी बच्चे रहते बैर, कभी पति रहते बैर,
सबको सिर्फ़ यह मनाती, फिर भी सब लेते इनकी खैर ।
क्यों है इनकी हालत ऐसी,
कहाँ चली गई  इनकी शक्ति दुर्गा जैसी ।
क्यों यह घरों में सहमी सी रहती हैं ।
क्यों इनकी आवाज़ आंदोलन के लिए नहीं उठती है ।
कौन है ओ जो इन्हे डराकर रखता है,
दहेज के नाम पर हर ज़ुर्म इनपर थोपता है ।
माँ तुम उठो और लड़ो, डरो मत यह समाज अपना है ।
बेटियों को पैदा करने के लिए हर माँ ने साहस दिखाया है ।
यह समाज है सिर्फ़ लोभी, पैसे दो तो खोलेंगे मुँह ढ़ोंगी,
समाज का काम है कहना, पर अन्याय होते समय,
तुम मत बन जाना गूँगी ॥

                                     आकांक्षा परिजात
                                  कक्षा- नवीं
                                    के.वि.२,दिल्ली छावनी

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