माँ
क्यों
झेलना पड़ता है इन्हें हर दुख ।
क्यों
नहीं है इनकी सिस्मत में सुख ।
कभी
बच्चे रहते बैर, कभी पति रहते बैर,
सबको
सिर्फ़ यह मनाती, फिर भी सब लेते इनकी खैर ।
क्यों
है इनकी हालत ऐसी,
कहाँ
चली गई इनकी शक्ति दुर्गा जैसी ।
क्यों
यह घरों में सहमी सी रहती हैं ।
क्यों
इनकी आवाज़ आंदोलन के लिए नहीं उठती है ।
कौन
है ओ जो इन्हे डराकर रखता है,
दहेज
के नाम पर हर ज़ुर्म इनपर थोपता है ।
माँ
तुम उठो और लड़ो, डरो मत यह समाज अपना है ।
बेटियों
को पैदा करने के लिए हर माँ ने साहस दिखाया है ।
यह
समाज है सिर्फ़ लोभी, पैसे दो तो खोलेंगे मुँह ढ़ोंगी,
समाज
का काम है कहना, पर अन्याय होते समय,
तुम
मत बन जाना गूँगी ॥
आकांक्षा परिजात
कक्षा- नवीं
के.वि.२,दिल्ली छावनी
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