Sunday, April 8, 2012

आत्मपरिचय (हरिवंशराय बच्चन)



आत्मपरिचय बच्चन जी के काव्य संग्रह निशा निमंत्रण से ली गई है जो सन्‌ १९३८ में प्रकाशित हुई । प्रस्तुत गीत में बच्चन जी की पूरी काव्य कला झलकती है । मनिष्य एक सामाजिक प्राणी है और समाज से उसका नाता अटूट है ।पूरे गीत में एक विरोधाभाष दिखाई देता है । यथा- मैं जगजीवन का भार लिए फिरता हूँ , फिर भी जीवन में प्यार लिए फिरता हूँ ; कवि कहता है कि वह दुनिया का ध्यान किए बिना केवल प्रेम रूपी सुरा का पान करता है । वह सच्चे प्रेम में विश्वास करता है । जबकि दुनिया के लोग इतने स्वार्थी हैं कि जो उनका गुणगान करते हैं दुनिया के लोग उसी को पूछते हैं । लेकिन कवि को यह अपूर्ण संसार यानी यह भौतिक संसार नहीं भाता है इसलिए वह स्वप्नों के संसार में विचरण करता है । कवि का दार्शनिक तब और उजागर होता है जब वह यह कहता है कि दुनिया के सभी ऋषि-मुनि प्रयत्न करके मिट गये पर कोई सत्य जान नहीं पाया इसलिए कवि सीखा ज्ञान भूलाना सीख रहा है - कर यत्न मिटे सब, सत्य किसी ने जाना ? नादान वहीं है,हाय, जहाँ पर दाना ! फिर मूढ़ न क्या जग, जो इस पर भी सीखे ? मैं सीख रहा हूँ , सीखा ज्ञान भुलाना ! कवि कहता है कि उसके रोने को दुनिया गाना कहती है और जब वह फूट कर रोता है तो उसको छंद का निर्माण कहती है । कवि अपने को एक कवि न मानकर दुनिया का एक नया दीवाना मानता है । और इसी दीवानगी में वह दीवानों का वेश लेकर घूम रहा है साथ ही उसके संदेशों में वह मस्ती है जिसको सुनकर दुनिया झूमने लगती है । यहाँ आकर कवि का गीत पूर्णता को प्राप्त करता है और कवि की साधना सफल होती दिखाई देती है । मई दीवानों का वेश लिए फिरता हूँ, मैं मादकता निःशेष लिए फिरता हूँ ; जिसको सुनकर जग झूम, झुके, लहराए, मैं मस्ती का संदेश लिए फिरता हूँ !

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