ऐसा सुनहरा दृश्य मैंने ।
नहीं देखा था इससे पहले ।
चाँद क्या उअर चाँदनी क्या !
सूरज क्या और रोशनी क्या !
सबसे सुनहरा यह दृश्य है ।
क्योंकि यह देहात का दृश्य है ।
दूर-दूर तक है खरिहानी ।
जिसमें फले गेहूँ की बाली ।
पके -पके और पीले-पीले ।
लहराते वे हौले-हौले ।
बीच में हैं चने के पौधे ।
जिनपर मोटे चने हैं बैठे ।
कहीं खड़े हैं आम के पेड़ ।
जिनपर लगे मंजरी के ढ़ेर ।
दूर खड़ा है बरगद एक ।
जहाँ बैठे हैं बच्चे अनेक ।
कोई गा रहा गाना ।
कोई देख रहा सपना ।
कोने पर है महुआ का पेड़ ।
जिसपर बैठे तोते अनेक ।
निसदिन करते टाँय-टाँय वे ।
सबका करते स्वागत वे ।
पुनगी पर है कोयल बैठी ।
वह भी धीरे-धीरे कुहकी ।
ऐसा लगता.......
स्वागत करती वह भी सबका ।
देखा नहीं था इससे पहले ।
ऐसा सुनहरा दृश्य मैंने ।
इसीलिए तो कहते हैं हम,
कभी न भूलो अपना गाँव ।
क्योंकि यहाँ है प्यार की छाँव ।
प्रियंका सिंह (दसवीं ’द’)
केन्द्रीय विद्यालय क्र.१,ईटानगर
नहीं देखा था इससे पहले ।
चाँद क्या उअर चाँदनी क्या !
सूरज क्या और रोशनी क्या !
सबसे सुनहरा यह दृश्य है ।
क्योंकि यह देहात का दृश्य है ।
दूर-दूर तक है खरिहानी ।
जिसमें फले गेहूँ की बाली ।
पके -पके और पीले-पीले ।
लहराते वे हौले-हौले ।
बीच में हैं चने के पौधे ।
जिनपर मोटे चने हैं बैठे ।
कहीं खड़े हैं आम के पेड़ ।
जिनपर लगे मंजरी के ढ़ेर ।
दूर खड़ा है बरगद एक ।
जहाँ बैठे हैं बच्चे अनेक ।
कोई गा रहा गाना ।
कोई देख रहा सपना ।
कोने पर है महुआ का पेड़ ।
जिसपर बैठे तोते अनेक ।
निसदिन करते टाँय-टाँय वे ।
सबका करते स्वागत वे ।
पुनगी पर है कोयल बैठी ।
वह भी धीरे-धीरे कुहकी ।
ऐसा लगता.......
स्वागत करती वह भी सबका ।
देखा नहीं था इससे पहले ।
ऐसा सुनहरा दृश्य मैंने ।
इसीलिए तो कहते हैं हम,
कभी न भूलो अपना गाँव ।
क्योंकि यहाँ है प्यार की छाँव ।
प्रियंका सिंह (दसवीं ’द’)
केन्द्रीय विद्यालय क्र.१,ईटानगर
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